REET Level 1 पर्यावरण अध्ययन Notes पर्वतारोहण

पर्वतारोहण (पहाड चढना)

REET Level 1 पर्यावरण अध्ययन Notes

पर्वतारोहण का मतलब उस खेल या शौक से है जिसमें पर्वतों पर चढ़ाई, स्काइंग अथवा सुदूर भ्रमण से है। इसमें चट्टानों पर चढ़ने की कला, बर्फ के ढके पर्वतों पर चढ़ने की कला और स्काइंग की कला है। पर्वतारोहण दुनिया भर में एक लोकप्रिय खेल बन चुका है। यू.आई.ए.ए. (Union Internationale des Associations d’Alpinisme) पर्वतारोहण के लिए विश्व भर में मान्य संस्था है जो पर्वतों तक जाने के रास्तों, चिकित्सा समस्यायों, बर्फ पर चढ़ाई से जुड़े अहम विषयों पर काम करती है।





1.नाईलोन की मजबूत रस्सी तथा हुक- इनका प्रयोग पहाड़ी पर खड़ी चढ़ाई चढ़ने के लिए किया जाता है।

  1. ऑक्सीजन सिलिंडर- अधिक ऊँचाई पर ऑक्सीजन की कमी होने के कारण ऑक्सीजन सिलिंडर का उपयोग करते है।
  2.  गैटर- यह एक विशेष किस्म का परिधान है।
  3. कील वाले जूते-ये बर्फ पर चलने तथा चट्टानों पर चढ़ने में काफी मदद करते है साथ ही फिसलने से बचाते हैं।
  4.  दस्ताने- पर्वतारोही बर्फ के पहाड़ों पर चढ़ते समय ठण्डी हवा व बर्फ से बचने के लिए हाथ में दस्ताने पहनते है।
  5. कुल्हाड़ी-यह चढ़ाई करते समय एक अमूल्य उपकरण है।
  6. दूरबीन- दूर की वस्तुओं को देखने के लिए काम में लेते है।
  7. पोर्टेबिल कैम्पिंग तम्बू- इसका प्रयोग पर्वतारोही आराम करने के लिए करते है।
  8. बर्फ तोड़ने के लिए एक खास तरह का हथौड़ा (आईस एक्स)
  9. आईस ग्लासेस और हैलमेट- फिसल जाने या गिर जाने पर चोट से बचने के लिए इस्तेमाल करते है।

 

एल्पायिन रास्तों पर ऑफ-पिस्ट सफर करते समय वक्त दलों को हमेशा इन वस्तुओं को ले जाने की सलाह दी जाती है।

 

(i) हिमस्खलन बीकन- यह बर्फ में फंसे हुए व्यक्तियों का पता लगाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है।

(ii) प्रोब- यह उपकरण बर्फ की गहराई के मापन में उपयोग में लाते है।

(iii) बेलचा– यह बर्फ में गड्ढा करने के लिए प्रयोग में लिया जाता है। (हाथ के स्थान पर बेलचा से गड्ढा पाँच गुना तेजी से किया जा सकता है।)

 




आश्रय- पहाड़ों में मौसम बहुत अप्रत्याशित होता है इसलिए स्थितियों के आधार पर पर्वतारोही अलग-अलग रूपों में आश्रयों का उपयोग करते है। पर्वतारोही के लिए आश्रय, सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण पहलू है

 

आश्रय निम्न प्रकार के होते हैं

आधार शिविर-  शिखर पर जाने के प्रयास के लिए आधार शिविर का उपयोग किया जाता है। आधार शिविर ऊपर की कठिन परिस्थितियों में सुरक्षित स्थानों पर बनाये जाते हैं।

झोपड़ी- विशेष रूप से यूरोपीय अल्पाइन क्षेत्रों में पहाड़ी झोपड़ियों का एक नेटवर्क है। फ्रांस में इन्हें रेफ्युजेस, इटली में रिफूगी, स्विट्जरलैंड में कबानेस, जर्मनी और ऑस्ट्रिया में हटेन, स्लोवनिया में कोका, स्पेन में रेफ्युजियोस तथा नॉर्वे में हाईत्त के नाम से जाना जाता है। प्रत्येक झोपड़ी में आम तौर पर एक सामाजिक भोजन कक्ष होता है और उनमें  गद्दे, कंबल तथा तकिए आदि सुविधायें होती हैं। पर्वतारोही यहाँ रुक कर विश्राम करते हैं। कुछ झोपडियों में एक हिस्सा हमेशा खुला रहता है। जिन्हें विंटर हट कहते हैं। जब यह खुली होती हैं तब झोपिड़यां वेतन पाने वाले कर्मचारियों द्वारा चलायी जाती हैं, हालाँकि इनमें से कुछ को स्वैच्छिक कर्मचारी भी चलाते हैं जो अल्पाइन क्लबों के सदस्य होते हैं।

बिवी या बिव्वी – पर्वतारोहण के संदर्भ में बिवी एक आराम या सोने की अस्थायी व्यवस्था है, जिसमें पर्वतारोही को कैम्पिंग की पारंपरिक जगह में ठहरने, खाने और उपकरणों की पूर्ण सुविधाओं से कम सुविधा प्राप्त होती है इसमें केवल एक स्लीपिंग बैग और पड़ाव की बोरी लेना और सोना शामिल है।

तम्बू- यह तम्बू पर्वतों में सर्वाधिक उपयोग होने वाले आश्रय हैं। ये साधारण ताप किन के टुकड़ों से लेकर अत्यधिक भारी डिजाईन वाले होते हैं जो पर्वत की दुष्कर परिस्थितियों से बचने में मदद करते हैं। तम्बू

लगाने का एक खतरा यह हैं कि तेज हवाएं और भारी बर्फबारी खतरनाक हो सकती है और इस कारण से तम्बू खराब होकर टूट सकता है। इसके अलावा, तम्बू के कपड़े की निरंतर फड़फड़ाहट से नींद में बाधा उत्पन्न हो सकती है।

बर्फ की गुफा- जहाँ परिस्थितयां अनुकूल होती हैं वहाँ बर्फ की गुफाएँ पर्वत पर आश्रय का एक अन्य तरीका है। बर्फ की गुफाएँ टेंट की तुलना में काफी ज्यादा गर्म और शांत होती हैं ठीक तरह से बनाई गयी बर्फ की गुफा का तापमान शून्य के आसपास मंडराता रहता है। जिसके सापेक्ष बाहरी तापमान गर्म हो सकता है। कुछ पर्वतारोहियों द्वारा इग्लू का प्रयोग किया जाता है।

पर्वतारोहण में कठिनाईयाँ एवं खतरे खतरे- पर्वतारोहण में दो प्रकार के खतरे होते हैं

  1. वस्तुगत खतरे-

    वस्तुगत खतरे पर्यावरण से सम्बन्धित होते है जो पर्वतारोही के उपस्थित न होने पर भी उपस्थित होते हैं, जैसे चट्टानों का गिरना, हिमस्खलन तथा खराब मौसम। तूफानों और हिमस्खलन के कारण निरंतर परिवर्तित होने वाले रास्ते को वस्तुगत खतरे का उच्च स्तर माना जाता है। पर्वतारोहियों का खतरों का ध्यान रखना चाहिए: गिरती चट्टानें, गिरती बर्फ, हिमस्खलन, पर्वतारोही का गिरना, बर्फीली ढलानों से गिरना, बर्फीली ढलानों का गिरना, बर्फीली दरादों में गिरना और ऊँचाई तथा मौसम के खतरे। चट्टानों का आकार पत्थरों के गिरने के कारण निरंतर परिवर्तित होता रहता है, जिस कारण से धोखा हो सकता है। गिरती चट्टानें पर्वत पर गढ्ढे बना देती हैं और इन गढ़ढ़ों (खड्डों) पर काफी सावधानी से चढ़ना होता है, इनके किनारे प्रायः सुरक्षित होते हैं ऐसे रास्तों पर गिरती चट्टानों का पता लगाने के लिए स्थानीय अनुभव मूल्यवान सिद्ध होते हैं।

 2.व्यक्तिपरक खतरे-  व्यक्तिपरक खतरे एक पर्वतारोही के खराब निर्णय, खराब नियोजन तथा कौशल की कमी से है। अपर्याप्त तकनीक भी व्यक्तिपरक खतरे का उदाहरण है।

3. बर्फ गिरना- 

   बर्फ गिरने की प्रबल संभावना वाले स्थानों का सटीक पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। यह हिमनदों के टूटे भागों में और सकरी पर्वतश्रेणियों के शिखर पर निर्मित लटकते किनारों से गिरती है।

 4.चट्टानों का गिरना-

एक शिला पर्वतारोही की दक्षता उसके पद व हस्त रखने के विकल्प तथा चयन करने के बाद उनको जमाये रखने के कौशल से जाहिर होती है। यह काफी हद तक उस चट्टान की क्षमता का अनुमान लगाने की काबिलियत पर निर्भर करता है, जिस पर वह खड़ा है। कई कमजोर चट्टानें एक व्यक्ति का वजन सहने के लिए पर्याप्त मजबूत होती हैं, लेकिन यह जानने के लिए अनुभव की आवश्यकता होती है। कुछ कमजोर चट्टानों पर रस्सी लगाते समय विशेष ध्यान की आवश्यकता होती है, क्योंकि इनसे पत्थर के नीचे गिरने की संभावना प्रबल रहती है। इसी तरह इन पर पैर व हाथ रखते हुए भी उचित ध्यान

चाहिए, कठोर चट्टानों पर आपसी सहायता का बड़ा महत्त्व होता, है। दो या तीन आरोही एक दूसरे की सहायता से आगे बढ़ते हैं अथवा दूसरे द्वारा पैरों के लिए लगाई गयी बर्फ की कुल्हाड़ी पर पैर रखकर आपसी सहयोग है। सबसे प्रमुख सिद्धांत यह है कि दल के सभी सदस्य एक दूसरे की सहायता से चढ़ाई करते हैं न कि एक स्वतंत्र इकाई के रूप में खराब मौसम के बाद खड़ी चट्टानों पर बर्फ की एक परत (इस परत को वेरग्लास कहते हैं) प्राय: पाई जाती है, जो इसे और भी दुर्गम बना देती है। ऐसी स्थिति में क्रेम्पोन अत्यंत लाभकारी हैं।

हिमस्खलन – हिमस्खलन कई प्रकार के होते हैं, लेकिन इनमें दो प्रकार सबसे महत्वपूर्ण हैं:

शिला हिमस्खलन: – यह हिमस्खलन तब घटित होता है जब बर्फ की एक बड़ी शिला टूट कर ढलान पर नीचे की तरफ फिसलना शुरू कर देती है। यह सबसे बड़े और सबसे खतरनाक होते हैं।

(1) सख्त शिला हिमस्खलन: – इस प्रकार के हिमस्खलन का निर्माण एक ससक्त शिला में कड़ाई के साथ जमी बर्फ से होता है। यह शिला आसानी से नहीं टूटती है क्योंकि ये पर्वत से नीचे खिसक जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप बड़े टुकड़े पर्वत के नीचे टूटना शुरू हो जाते हैं।

(i). मुलायम शिला हिमस्खलन: – इस प्रकार के हिमस्खलन का निर्माण भी इकट्ठा हुई बर्फ के ससक्त परत से होता है, यह शिला आसानी से टूट जाती है।





ढीली बर्फ का हिमस्खलन: – इस प्रकार के हिमस्खलन बहती हुई थोड़ी सी बर्फ के बड़े खंडों में जमा होने के कारण निर्मित होते हैं। इसे गीली स्लाइड या बिन्दु रिलीज हिमस्खलन भी कहते हैं। इस प्रकार के स्खलन भ्रामक रूप से खतरनाक होते हैं क्योंकि ये किसी आरोही या स्कीयर के पैरों को फँसा कर उसमें दफन भी कर सकता है या उन्हें किसी खड़ी चट्टान में फँसा भी सकती है।

बर्फ की ढलानें: – बर्फ की ढलानें आम हैं और इन पर चढ़ाई करना भी आमतौर पर आसान होता है। हिमपाद या बर्फ की ढलान के नीचे सामान्यत: एक बड़ी हिम दरार होती है, जिसे बर्गस्क्रंड कहते हैं। खस्ता हाल खड़ी बर्फ की ढलान भी खतरनाक हो सकती है क्योंकि इसकी बर्फ का पूरा भाग एक स्खलन के रूप में आरम्भ हो सकता है। यदि ऐसी ढलानों पर टेढ़ा चढ़ने के स्थान पर सीधा चढ़ा जाए तो ये ज्यादा सुरक्षित होती है क्योंकि तिरछे या क्षैतिज रास्ते इन्हें काटने लगते हैं और इनका द्रव बहना आरम्भ हो जाता है। सुबह बर्फ की ढलानें कड़ी और सुरक्षित होती हैं, परन्तु इसी प्रकार से दोपहर में कुछ नर्म और खतरनाक होती जाती है। इसलिए जल्दी चलने में फायदा है।

हिम दरारें:  हिम दरार वे दरारें या गहरी खाईयां हैं जो किसी हिमनद के पदार्थों के असमान तल से गुजरने पर निर्मित होती हैं। ये खुली या छिपी हुई होती हैं। हिमनद के निचले भागों में हिम दरारें खुली रहती हैं। बर्फ रेखा के ऊपर ये प्राय: सर्दी की बर्फ के धनुषाकार संचय से छिप जाती हैं । छुपी दरारों का पता लगाना बड़ी सावधानी और  अनुभव का काम है। किसी को भी कभी भी बर्फ से ढका हिमनद तब । तक पार नहीं करना चाहिए जब तक उसके पास रस्सी न हो या फिर दो | इन्ह साथी हो तो और अच्छा है।




खराब मौसम – खराब मौसम के कारण बर्फ और चट्टान कि स्थितियों में होने वाले परिवर्तन मुख्य रूप से खतरनाक होते हैं। मिना ज्यादातर पहाड़ी क्षेत्रों में स्थानीय तूफान सुबह के बाद और दोपहर के (ए पहले उत्पन्न होते हैं। अधिकतर पर्वतारोही ‘अल्पाइन शुरुआत’ लेते | हैं जो सुबह से पहले या पहली किरण से होता है ताकि गतिविधि और बिजली तेज होने पर और अन्य मौसमी खतरों से सुरक्षित | रहें। तेज हवाएँ हाइपोथर्मिया के आक्रमण को बढ़ा सकती है साथ ही उपकरणों को भी  नष्ट कर सकती हैं।





ऊँचाई:- तेजी से चढ़ाई करने से ‘ऐटीट्यूड सिकनेस’ हो सकती | है इसका सबसे अच्छा इलाज यह है कि तुरंत नीचे उतर आयें। बहुत ऊँचाई पर आरोही का नारा होता है कि ‘ऊँचा चढो, कम सो’ जिसका अर्थ है कि संरक्षक अभ्यस्त होने के लिए ऊँचे पर्वत पर चढ़ें लेकिन सोने के लिए नीचे उतर आए। दक्षिण अमेरिका के एंडीज़ में ऐटीट्यूड का सिकनेस बीमारी से बचने के लिए पारम्परिक रूप से कोका की पत्तियों को चबाया जाता है। ऐटीट्यूड सिकनेस के सामान्य लक्षणें में सख्त सिरदर्द, सोने की समस्या, मितली, भूख की कमी, सुस्ती और बदन दर्द है। पर्वतीय कमजोरी बढ़कर हेस (हाई ऐटीट्यूड सेरेब्रल एडेमा) और हेप (हाई ऐटीट्यूड पल्मनरी एडेमा) में बदल सकती है इन दोनों से 24 घंटे के अन्दर मौत हो सकती है।

ऊँचे पर्वतों में वायुमण्डलीय दाब कम हो जाता  है जिससे सांस के लिए ओक्सीजन की कमी होती है। यह ऐटीट्यूड सिकनेस का आधारभूत कारण है। सामान्यतया, 7000 मीटर से ऊपर की चढ़ाई करते समय पर्वतरोही बोतलबंद कृत्रिम ऑक्सीजन का प्रयोग करते है।

सौर विकिरण – ऊँचाई में सौर विकिरण काफी बढ़ जाता है क्योंकि ऊँचाई बढ़ने पर वायुमंडल पतला होता जाता है जिससे वायुमण्डल पराबैंगनी विकिरणों को कम अवशोषित करता है। जिस कारण से धूप में झुलसने और बर्फ के अंधेपन का खतरा 75% तक बढ़ जाता है।



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